नफरत नहीं , मगर अब मोहब्बत भी कहा है,
मिलने की आरज़ू तो है ,मगर अब बात करने की चाहत ही कहा है,
साहब, ऐसी मोहब्बत से हमें मोहब्बत ही कहा है,
चाहत है, मगर अब मिलने की आस ही कहा है,
कहते है प्यार करने से ही प्यार मिलता है,
मगर इस मोह्हबत से कुछ मिलने की उम्मीद ही कहा है,
अगर मान भी लू की चाहत है, तो जनाब मोहब्बत ही कहा है,
और अगर मोहब्बत भी है तो इस इश्क़ मे वो सुकून ही कहा है,
सुकून नहीं मगर इस इश्क़ से हमें नफरत भी कहा है.
-Kiranpragati 