जो मेरे सारे राज़ की एक किताब थी ,
उसने कहा मेरी मोह्हबत बेहिसाब थी ,
जो मेरे हर वक़्त की साथी है,
उसने कहा बस तू इश्क़ करना छोड़ दे , इतना टूट गयी अब यही काफी है ,
जिंदगी के कुछ पन्ने उसके साथ लिखें थे मैंने ,
बाकी का उसने ही लिखवाया था ,
कहा तेरी तरफ से कह दिया मैंने ,
जवाब मे उसका ना था ,
कहती थी वो मै इश्क़ टूट कर करती हु ,
मगर इश्क़ मे टूट कर ही गलती कर देती हु ,
ये भी कहा के इस इश्क़ मे टूटना फ़िज़ूल है ,
मगर समझती है वो की इस दिल के टूटने मे मेरा शायद ही कोई कसूर है ,
दिलासा देती है तुम दोनों मिलोगे एक दिन ज़रूर ,
इसमें ना तेरा पर ना ही है उसका कसूर ,
बोलती है कोई और दुआ कर रहा होगा मेरे वास्ते ,
जिस दुआ ने अलग कर दिए मेरे और उसके रास्ते ,
जो उससे कीमती होगा और उससे भी हसीन ,
वो कहती है की सब्र कर ये इश्क़ नहीं मगर ,
दूसरा मिलेगा ही तुझे कभी ना कभी ….
