
कभी सोचा है, भाग रहे हो तुम जिसके पीछे,
वो मिल गया तो क्या करोगे,
जिसकी क़ुरबत से उल्फत है,
वो ही मुसलसल ना रहा तो क्या करोगे,
क्या होगा अगर,
दो तरफा चाहत मे, एक तरफा बेकरारी ही रहे,
क्या हुआ अगर वो तुमको उस मुक़ाम पर पंहुचा दे,
जहाँ तमन्ना सिर्फ खुद की तबस्सुम की ही रहे…
-प्रगति
2 responses to “कभी सोचा है”
आपके खयालों ने हर अंग को भाव विभोर कर दिया है। प्रगति तुम्हारे लेख में भावना है जो सभी रोम रोम में बसा है।
बहुत सुंदर ❤️💫
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शुक्रिया ❣️
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